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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्राससादातिवलं भुजङ्गं; क्षुधार्दितं मृत्युमिवोग्ररूपम् |  १८   क
वृकोदरः पर्वतकन्दराय़ां; विषादमोहव्यथितान्तरात्मा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति