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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
समुच्छ्रय़ान्पर्वतसंनिरोधा; न्गोष्ठान्गिरीणां गिरिसेतुमालाः |  ३   क
वहून्प्रपातांश्च समीक्ष्य वीराः; स्थलानि निम्नानि च तत्र तत्र ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति