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सौप्तिक पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनार्जुन यद्दिव्यमस्त्रं ते हृदि वर्तते |  २   क
द्रोणोपदिष्टं तस्याय़ं कालः सम्प्रति पाण्डव ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति