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शान्ति पर्व
अध्याय ६५
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इन्द्र उवाच
सर्वोद्योगैराश्रमं धर्ममाहुः; क्षात्रं ज्येष्ठं सर्वधर्मोपपन्नम् |  ६   क
स्वं स्वं धर्मं ये न चरन्ति वर्णा; स्तांस्तान्धर्मानय़थावद्वदन्ति ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति