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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
समेत्य राज्ञा वृषपर्वणस्ते; प्रत्यर्चितास्तेन च वीतमोहाः |  ७   क
शशंसिरे विस्तरशः प्रवासं; शिवं यथावद्वृषपर्वणस्ते ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति