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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके कुरुनन्दन |  ६३   क
रुद्रकोटिस्तथा कूपे ह्रदेषु च महीपते |  ६३   ख
इलास्पदं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम ||  ६३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति