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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
ऊषुस्ततस्तत्र महानुभावा; नाराय़णस्थानगता नराग्र्याः |  ९   क
कुवेरकान्तां नलिनीं विशोकाः; सम्पश्यमानाः सुरसिद्धजुष्टाम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति