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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
ते हय़ाश्चन्द्रसङ्काशाः केशवेन प्रचोदिताः |  ४३   क
पिवन्त इव तद्व्योम जग्मुर्द्रौणिरथं प्रति ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति