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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
सर्गप्रलय़ एतावान्प्रकृतेर्नृपसत्तम |  ३३   क
एकत्वं प्रलय़े चास्य वहुत्वं च यदासृजत् |  ३३   ख
एवमेव च राजेन्द्र विज्ञेय़ं ज्ञेय़चिन्तकैः ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति