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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
स सम्प्रहारस्तुमुलो निशि प्रत्यभवन्महान् |  ३२   क
यथा सागरय़ो राजंश्चन्द्रोदय़विवृद्धय़ोः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति