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शान्ति पर्व
अध्याय १७५
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भीष्म उवाच
अहङ्कारस्य यः स्रष्टा सर्वभूतभवाय़ वै |  २१   क
यतः समभवद्विश्वं पृष्टोऽहं यदिह त्वय़ा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति