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शान्ति पर्व
अध्याय १७५
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भृगुरु उवाच
अनन्तमेतदाकाशं सिद्धचारणसेवितम् |  २३   क
रम्यं नानाश्रय़ाकीर्णं यस्यान्तो नाधिगम्यते ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति