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शान्ति पर्व
अध्याय १७५
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भृगुरु उवाच
ऊर्ध्वं गतेरधस्तात्तु चन्द्रादित्यौ न दृश्यतः |  २४   क
तत्र देवाः स्वय़ं दीप्ता भास्वराश्चाग्निवर्चसः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति