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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं वर्षाण्यतीतानि धृतराष्ट्रस्य धीमतः |  २५   क
वनवासे तदा त्रीणि नगरे दश पञ्च च ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति