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शान्ति पर्व
अध्याय १७५
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भृगुरु उवाच
यदा तु दिव्यं तद्रूपं ह्रसते वर्धते पुनः |  ३३   क
कोऽन्यस्तद्वेदितुं शक्तो योऽपि स्यात्तद्विधोऽपरः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति