वन पर्व  अध्याय १७५

वैशम्पाय़न उवाच

स ददर्श महाकाय़ं भुजङ्गं लोमहर्षणम् |  १२   क
गिरिदुर्गे समापन्नं काय़ेनावृत्य कन्दरम् ||  १२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति