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वन पर्व
अध्याय १७५
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वैशम्पाय़न उवाच
तेन संस्पृष्टमात्रस्य भिमसेनस्य वै तदा |  १७   क
सञ्ज्ञा मुमोह सहसा वरदानेन तस्य ह ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति