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शल्य पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
स पार्थिवो नित्यममर्षितस्तदा; महारथः शिक्षितवत्परिभ्रमन् |  ६३   क
अताडय़त्पाण्डवमग्रतः स्थितं; स विह्वलाङ्गो जगतीमुपास्पृशत् ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति