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वन पर्व
अध्याय १७५
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वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा धनुष्पाणिर्वद्धखड्गो वृकोदरः |  ५   क
ददर्श तद्वनं रम्यं देवगन्धर्वसेवितम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति