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उद्योग पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
यथाग्निधूमो दिवमेति रुद्ध्वा; वर्णान्विभ्रत्तैजसं तच्छरीरम् |  ११   क
तथा ध्वजो विहितो भौवनेन; न चेद्भारो भविता नोत रोधः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति