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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य च यथान्याय़ं सङ्गम्य च महारथैः |  १०१   क
यथार्हमात्मनः कर्म रणे सात्वत दर्शय़ ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति