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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
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सूत उवाच
पप्रच्छ तमृषिं चापि वैशम्पाय़नमच्युतम् |  १८   क
कथावशेषं धर्मज्ञो वनवासस्य सत्तम ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति