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शान्ति पर्व
अध्याय १७६
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भरद्वाज उवाच
प्रजाविसर्गं विविधं कथं स सृजते प्रभुः |  १   क
मेरुमध्ये स्थितो व्रह्मा तद्व्रूहि द्विजसत्तम ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति