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अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
देवान्रथवरं कृत्वा विनिय़ुज्य च सर्वशः |  २८   क
त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तेन तानि विभेद सः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति