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वन पर्व
अध्याय १७६
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वैशम्पाय़न उवाच
नासि केवलसर्पेण तिर्यग्योनिषु वर्तता |  १७   क
गृहीतः कौरवश्रेष्ठ वरदानमिदं मम ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति