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वन पर्व
अध्याय १७६
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वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतस्य त्वय़ा राजन्प्राणिनोऽपि वलीय़सः |  २२   क
सत्त्वभ्रंशोऽधिकस्यापि सर्वस्याशु भविष्यति ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति