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वन पर्व
अध्याय १७६
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वैशम्पाय़न उवाच
दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमर्हति |  २७   क
दैवमेव परं मन्ये पुरुषार्थो निरर्थकः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति