वन पर्व  अध्याय १७६

वैशम्पाय़न उवाच

समर्थः स महावाहुरेकाह्ना सुमहावलः |  ३३   क
देवराजमपि स्थानात्प्रच्यावय़ितुमोजसा ||  ३३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति