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वन पर्व
अध्याय १७६
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वैशम्पाय़न उवाच
किं पुनर्धृतराष्ट्रस्य पुत्रं दुर्द्यूतदेविनम् |  ३४   क
विद्विष्टं सर्वलोकस्य दम्भलोभपराय़णम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति