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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
षड्विंशोऽहमिति प्राज्ञो गृह्यमाणोऽजरामरः |  १६   क
केवलेन वलेनैव समतां यात्यसंशय़म् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति