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आदि पर्व
अध्याय २१४
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वैशम्पाय़न उवाच
वेणुवीणामृदङ्गानां मनोज्ञानां च सर्वशः |  २५   क
शव्देनापूर्यते ह स्म तद्वनं सुसमृद्धिमत् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति