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शान्ति पर्व
अध्याय १७७
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भृगुरु उवाच
तेजोऽग्निश्च तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा तथैव च |  २१   क
अग्निर्जरय़ते चापि पञ्चाग्नेय़ाः शरीरिणः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति