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शान्ति पर्व
अध्याय १७७
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भृगुरु उवाच
श्रोत्रं घ्राणमथास्यं च हृदय़ं कोष्ठमेव च |  २२   क
आकाशात्प्राणिनामेते शरीरे पञ्च धातवः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति