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शान्ति पर्व
अध्याय १७७
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भृगुरु उवाच
प्राणात्प्रणीय़ते प्राणी व्यानाद्व्याय़च्छते तथा |  २४   क
गच्छत्यपानोऽवाक्चैव समानो हृद्यवस्थितः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति