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शान्ति पर्व
अध्याय १७७
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भृगुरु उवाच
भूमेर्गन्धगुणान्वेत्ति रसं चाद्भ्यः शरीरवान् |  २६   क
ज्योतिः पश्यति चक्षुर्भ्यां स्पर्शं वेत्ति च वाय़ुना ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति