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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रमेव महाप्राज्ञ गान्धारीं शमय़िष्यसि |  २७   क
पितामहश्च भगवान्कृष्णस्तत्र भविष्यति ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति