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शान्ति पर्व
अध्याय १७७
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भृगुरु उवाच
शव्दस्पर्शौ तु विज्ञेय़ौ द्विगुणो वाय़ुरुच्यते |  ३३   क
वाय़व्यस्तु गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च वहुधा स्मृतः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति