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शान्ति पर्व
अध्याय २६५
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भीष्म उवाच
शनैर्निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च |  २१   क
धर्मात्मा चैव भवति मोक्षं च लभते परम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति