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शान्ति पर्व
अध्याय २९४
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वसिष्ठ उवाच
न चाभिमन्यते किञ्चिन्न च वुध्यति काष्ठवत् |  १७   क
तदा प्रकृतिमापन्नं युक्तमाहुर्मनीषिणः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति