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वन पर्व
अध्याय १७७
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युधिष्ठिर उवाच
व्रूहि सर्प यथाकामं प्रतिवक्ष्यामि ते वचः |  १३   क
अपि चेच्छक्नुय़ां प्रीतिमाहर्तुं ते भुजङ्गम ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति