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वन पर्व
अध्याय १७७
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सर्प उवाच
व्राह्मणः को भवेद्राजन्वेद्यं किं च युधिष्ठिर |  १५   क
व्रवीह्यतिमतिं त्वां हि वाक्यैरनुमिमीमहे ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति