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वन पर्व
अध्याय १७७
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सर्प उवाच
वेद्यं यच्चात्थ निर्दुःखमसुखं च नराधिप |  १९   क
ताभ्यां हीनं पदं चान्यन्न तदस्तीति लक्षय़े ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति