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वन पर्व
अध्याय १७७
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युधिष्ठिर उवाच
यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स व्राह्मणः स्मृतः |  २१   क
यत्रैतन्न भवेत्सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति