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वन पर्व
अध्याय १७७
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युधिष्ठिर उवाच
एवमेतन्मतं सर्प ताभ्यां हीनं न विद्यते |  २३   क
यथा शीतोष्णय़ोर्मध्ये भवेन्नोष्णं न शीतता ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति