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वन पर्व
अध्याय १७७
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युधिष्ठिर उवाच
एवं वै सुखदुःखाभ्यां हीनमस्ति पदं क्वचित् |  २४   क
एषा मम मतिः सर्प यथा वा मन्यते भवान् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति