वन पर्व  अध्याय १७७

वैशम्पाय़न उवाच

स धर्मराजमालक्ष्य भ्राता भ्रातरमग्रजम् |  ३   क
कथय़ामास तत्सर्वं ग्रहणादि विचेष्टितम् ||  ३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति