वन पर्व  अध्याय १७७

सर्प उवाच

ऐश्वर्यमदमत्तोऽहमवमन्य ततो द्विजान् |  ९   क
इमामगस्त्येन दशामानीतः पृथिवीपते ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति