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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
रजसा चाप्ययं देही देहवाञ्शव्दवच्चरेत् |  २१   क
कार्यैरव्याहतमतिर्वैराग्यात्प्रकृतौ स्थितः |  २१   ख
आ देहादप्रमादाच्च देहान्ताद्विप्रमुच्यते ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति