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शान्ति पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
यजतां विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः |  ११   क
वनवासकृतं दुःखं भविष्यति सुखाय़ नः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति