आदि पर्व  अध्याय १७८

वैशम्पाय़न उवाच

ते विक्रमन्तः स्फुरता दृढेन; निष्कृष्यमाणा धनुषा नरेन्द्राः |  १६   क
विचेष्टमाना धरणीतलस्था; दीना अदृश्यन्त विभग्नचित्ताः ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति